परिवार वाली तकरार
ब्याज दरों के मसले पर सरकार और आरबीआइ के बीच वैचारिक टकराव को ज्यादा तूल देने की जरूरत नहीं है। पहले भी ऐसी उलझने आई हैं जो समय के साथ सुलझ भी गईं
प्रणव सिरोही
पिछली मौद्रिक नीति समीक्षा में भारतीय रिजर्व बैंक यानी आरबीआइ ने ब्याज दरों में कोई कटौती नहीं की। उधर सरकार को ब्याज दरें घटने की उम्मीद थी। स्पष्ट है कि आरबीआइ ने दरें तय करने में सरकारी संकेतों को तवज्जो नहीं दी। यहां तक सब ठीक है। अक्सर ऐसा होता भी आया है, मगर बेहद मितभाषी और सुर्खियों से दूर रहने वाले रिजर्व बैंक के गवर्नर उर्जित पटेल के इस मौके पर एक बयान ने खासी हलचल पैदा कर दी। उन्होने सार्वजनिक रूप से कहा कि सरकार की इच्छा के बावजूद मौद्रिक नीति समिति यानी एमपीसी सदस्यों ने वित्त मंत्रालय के साथ मुलाकात करने से इन्कार कर दिया। आरबीआइ के इस रुख पर उसी दिन शाम को सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यन के तल्ख बयान से मामले ने और तूल पकड़ लिया। अखबारों को अगले दिन के लिए पहले पन्ने की खबर मिल गई कि सरकार और केंद्रीय बैंक के बीच सब कुछ ठीक नहीं चल रहा।
लगता है कि सरकार दिल्ली से रिजर्व बैंक के गवर्नर के कान में जो कुछ कहती है, उसे वह मुंबई पहुंचते ही भूल जाता है। हाल के दौर को देखते हुए तो कम से कम यही लगता है। संप्रग सरकार में सुब्बाराव और राजन दोनों गवर्नर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की पसंद थे, लेकिन रिजर्व बैंक की कमान संभालते ही दोनों ने ब्याज दरों के मामले में सरकार को उपकृत करना गवारा नहीं समझा। इसी तरह मौजूदा सरकार में पटेल ने अभी तक एक दफा ही ब्याज दरों में कटौती कर इस लिहाज से सरकार को मायूस ही किया है। हालांकि इसकी आशंका पहले से ही जताई भी जा रही थी। असल में आर्थिक सोच के लिहाज से भी केंद्रीय बैंकरों को हॉक और डोव की श्रेणियों में रखा जाता है। हॉक यानी मौद्रिक नीति को लेकर अमूमन सख्त रवैया रखने वाले और डोव अपेक्षाकृत नरम मौद्रिक नीतियों के समर्थक। सुब्बाराव, राजन और पटेल तीनों हॉक माने जाते हैं। जब पटेल का नाम गवर्नर पद के लिए चर्चा में था तब इस पहलू को भी बार-बार उभारा गया कि वह मूल रूप से हॉकिश हैं और ब्याज दरों को लेकर बेहद सख्त गवर्नर माने गए राजन के कार्यकाल में आरबीआइ के मौद्रिक नीति विभाग की कमान पटेल के हाथ में ही थी। यही विभाग ब्याज दरों की रूपरेखा का आधार तैयार करता आया है।
वैसे फिलहाल मामला सिर्फ सरकार के संकेतों को समझने का नहीं, बल्कि खुद आरबीआइ की साख से भी जुड़ा है। खासतौर से नोटबंदी के बाद उसकी स्वायत्तता को लेकर तमाम सवाल उठे हैं। ऐसे में अपने क्षेत्राधिकार को लेकर उसके आग्र्रह समझ आते हैं। आरबीआइ की गिनती भारत के सर्वाधिक सक्षम संस्थानों में होती है और आज भारत की गिनती दुनिया की सबसे उदीयमान अर्थव्यवस्था में होती है तो उसमें केंद्रीय बैंक के योगदान को जरा भी नहीं नकारा जा सकता। चाहे 1991 के संकट में सी रंगराजन हों या 1997 के एशियाई संकट से उपजी वित्तीय मुश्किल की सुनामी को थामने में विमल जालान। या उनकी समृद्ध परंपरा को आगे बढ़ाकर देश के विदेशी मुद्रा भंडार को 300 अरब डॉलर के प्रतिमान तक ले जाने वाले वाइवी रेड्डी या 2008 की वैश्विक वित्तीय मंदी से अर्थव्यवस्था को उबारने वाले सुब्बाराव। सभी ने अपनी क्षमताओं को बखूबी साबित किया है। मगर यह तभी संभव हुआ जब सरकार और केंद्रीय बैंक में सही तालमेल रहा।
जहां तक ब्याज दरों का मसला है तो इस साल बेहतर मॉनसून के आसार हैं जिससे बेहतर उत्पादन के दम पर आपूर्ति बेहतर होने से महंगाई के काबू में रहने के ही आसार हैं। ऐसे में मुद्रास्फीति को लेकर बैंक को संकुचित दृष्टिकोण से बचना चाहिए। उसे ब्याज दरों पर विचार करना ही होगा, क्योंकि वास्तविक उधारी दरें अभी भी ऊंचे स्तर पर हैं। वहीं सरकार को भी किसानों की कर्जमाफी जैसे मसलों पर रिजर्व बैंक की राय पर ध्यान देना चाहिए, क्योंकि बैंकिंग तंत्र पहले से ही एनपीए के बोझ तले कराह रहा है। बैंकिंग नियामक होने के चलते आरबीआइ अपनी इस जिम्मेदारी से भी मुंह नहीं मोड़ सकता। दोनों पक्षों को बस एक-एक कदम पीछे खींचने की दरकार है, क्योंकि कहते हैं कि लंबी छलांग लगाने के लिए पीछे भी हटना होता है। नोटबंदी के बाद और जीएसटी से पहले सरकार और उसके बैंक में तकरार अर्थव्यवस्था की सेहत के लिए खराब ही होगी। वैसे इस पूरे प्रकरण पर जेटली की संयमित एवं परिपक्व प्रतिक्रिया यही संकेत करती है कि इस मोर्चे पर ज्यादा परेशान होने की जरूरत नहीं। यह परिवार के बीच विचारों का टकराव भर है।
ब्याज दरों के मसले पर सरकार और आरबीआइ के बीच वैचारिक टकराव को ज्यादा तूल देने की जरूरत नहीं है। पहले भी ऐसी उलझने आई हैं जो समय के साथ सुलझ भी गईं
प्रणव सिरोही
पिछली मौद्रिक नीति समीक्षा में भारतीय रिजर्व बैंक यानी आरबीआइ ने ब्याज दरों में कोई कटौती नहीं की। उधर सरकार को ब्याज दरें घटने की उम्मीद थी। स्पष्ट है कि आरबीआइ ने दरें तय करने में सरकारी संकेतों को तवज्जो नहीं दी। यहां तक सब ठीक है। अक्सर ऐसा होता भी आया है, मगर बेहद मितभाषी और सुर्खियों से दूर रहने वाले रिजर्व बैंक के गवर्नर उर्जित पटेल के इस मौके पर एक बयान ने खासी हलचल पैदा कर दी। उन्होने सार्वजनिक रूप से कहा कि सरकार की इच्छा के बावजूद मौद्रिक नीति समिति यानी एमपीसी सदस्यों ने वित्त मंत्रालय के साथ मुलाकात करने से इन्कार कर दिया। आरबीआइ के इस रुख पर उसी दिन शाम को सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यन के तल्ख बयान से मामले ने और तूल पकड़ लिया। अखबारों को अगले दिन के लिए पहले पन्ने की खबर मिल गई कि सरकार और केंद्रीय बैंक के बीच सब कुछ ठीक नहीं चल रहा।
कहते हैं कि जैसा नजर आता है, वैसा होता नहीं। इस मामले में भी कुछ वैसा ही है। असल में यह अपने-अपने किलों को महफूज रखने की कवायद भर है जहां कोई भी कमजोर नहीं दिखना चाहता। जहां सरकार का पूरा जोर अर्थव्यवस्था को तेजी देने पर है। इसके लिए ब्याज दरों का कम होना बेहद जरूरी है ताकि बाजार में मांग बढ़े और उद्यमियों को नई परियोजनाओं के लिए सस्ता कर्ज मिल सके। दूसरी ओर रिजर्व बैंक भी यही चाहता है कि अपने मूल दायित्वों को लेकर उस पर भी कोई अंगुली न उठे जिसमें महंगाई के खिलाफ मुहिम सबसे उसकी सबसे बड़ी जिम्मेदारी मानी जाती है। यहां अर्थशास्त्र का शास्त्रीय सिद्धांत आड़े आता है कि नरम मौद्रिक नीति से मुद्रा का प्रसार बढ़ेगा जिससे महंगाई में तेजी आएगी। यहां भी सरकार और रिजर्व बैंक दोनों पूरी तरह से दुरुस्त नहीं हैं, क्योंकि अर्थव्यवस्था को तेजी देने के लिए आर्थिक गतिविधियों को बढ़ाने में नरम ब्याज दरें सिर्फ एक पहलू भर हैं। इसमें कारोबार के लिए माहौल से लेकर जटिल कर प्रणाली तक तमाम अन्य कारक प्रभावी होते हैं। वहीं रिजर्व बैंक की यह रट भी सही नहीं है कि ब्याज दरें घटाने से महंगाई उफान पर आएगी, क्योंकि इसके लिए भी आपूर्ति श्रंखला से लेकर तमाम फौरी कारक भी जिम्मेदार होते हैं। फिर भी ब्याज दरों का मसला ऐसा है जिस पर वित्त मंत्रालय के मुख्यालय नॉर्थ ब्लॉक और मुंबई के मिंट रोड स्थित आरबीआइ के बीच अतीत से ही तलवारें खिंचती आई हैं। कई बार तो तल्खियां इतनी बढ़ीं कि वित्त मंत्री और गवर्नर के बीच बातचीत तक बंद हो गई। काफी समय तक देश के खजाने की चाबी संभालने वाले पलानिअप्पन चिदंबरम के पूंजी खाते को पूर्ण परिवर्तनीय बनाने के मसले पर तत्कालीन गवर्नर वाईवी रेड्डी के साथ तो दुवुरी सुब्बाराव के साथ ब्याज दरों के मसले पर तनातनी देखने को मिली। कहा जाता है कि चिदंबरम और रेड्डी के बीच बातचीत तक बंद हो गई थी। वहीं बतौर वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी और सुब्बाराव के बीच भी नियामकीय अधिकारों को लेकर लंबी कशमकश चली। इसी तरह मुद्रा बाजार के नियमन से लेकर ब्याज दरों में नरमी के मुद्दे पर जेटली और रघुराम राजन के रिश्तों में इतना खिंचाव आया कि एक अंतरराष्ट्रीय वित्त सम्मेलन पर उसकी छाप नजर आई जहां दोनों एक दूसरे से कन्नी काटते नजर आए।
लगता है कि सरकार दिल्ली से रिजर्व बैंक के गवर्नर के कान में जो कुछ कहती है, उसे वह मुंबई पहुंचते ही भूल जाता है। हाल के दौर को देखते हुए तो कम से कम यही लगता है। संप्रग सरकार में सुब्बाराव और राजन दोनों गवर्नर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की पसंद थे, लेकिन रिजर्व बैंक की कमान संभालते ही दोनों ने ब्याज दरों के मामले में सरकार को उपकृत करना गवारा नहीं समझा। इसी तरह मौजूदा सरकार में पटेल ने अभी तक एक दफा ही ब्याज दरों में कटौती कर इस लिहाज से सरकार को मायूस ही किया है। हालांकि इसकी आशंका पहले से ही जताई भी जा रही थी। असल में आर्थिक सोच के लिहाज से भी केंद्रीय बैंकरों को हॉक और डोव की श्रेणियों में रखा जाता है। हॉक यानी मौद्रिक नीति को लेकर अमूमन सख्त रवैया रखने वाले और डोव अपेक्षाकृत नरम मौद्रिक नीतियों के समर्थक। सुब्बाराव, राजन और पटेल तीनों हॉक माने जाते हैं। जब पटेल का नाम गवर्नर पद के लिए चर्चा में था तब इस पहलू को भी बार-बार उभारा गया कि वह मूल रूप से हॉकिश हैं और ब्याज दरों को लेकर बेहद सख्त गवर्नर माने गए राजन के कार्यकाल में आरबीआइ के मौद्रिक नीति विभाग की कमान पटेल के हाथ में ही थी। यही विभाग ब्याज दरों की रूपरेखा का आधार तैयार करता आया है।
वैसे फिलहाल मामला सिर्फ सरकार के संकेतों को समझने का नहीं, बल्कि खुद आरबीआइ की साख से भी जुड़ा है। खासतौर से नोटबंदी के बाद उसकी स्वायत्तता को लेकर तमाम सवाल उठे हैं। ऐसे में अपने क्षेत्राधिकार को लेकर उसके आग्र्रह समझ आते हैं। आरबीआइ की गिनती भारत के सर्वाधिक सक्षम संस्थानों में होती है और आज भारत की गिनती दुनिया की सबसे उदीयमान अर्थव्यवस्था में होती है तो उसमें केंद्रीय बैंक के योगदान को जरा भी नहीं नकारा जा सकता। चाहे 1991 के संकट में सी रंगराजन हों या 1997 के एशियाई संकट से उपजी वित्तीय मुश्किल की सुनामी को थामने में विमल जालान। या उनकी समृद्ध परंपरा को आगे बढ़ाकर देश के विदेशी मुद्रा भंडार को 300 अरब डॉलर के प्रतिमान तक ले जाने वाले वाइवी रेड्डी या 2008 की वैश्विक वित्तीय मंदी से अर्थव्यवस्था को उबारने वाले सुब्बाराव। सभी ने अपनी क्षमताओं को बखूबी साबित किया है। मगर यह तभी संभव हुआ जब सरकार और केंद्रीय बैंक में सही तालमेल रहा।
जहां तक ब्याज दरों का मसला है तो इस साल बेहतर मॉनसून के आसार हैं जिससे बेहतर उत्पादन के दम पर आपूर्ति बेहतर होने से महंगाई के काबू में रहने के ही आसार हैं। ऐसे में मुद्रास्फीति को लेकर बैंक को संकुचित दृष्टिकोण से बचना चाहिए। उसे ब्याज दरों पर विचार करना ही होगा, क्योंकि वास्तविक उधारी दरें अभी भी ऊंचे स्तर पर हैं। वहीं सरकार को भी किसानों की कर्जमाफी जैसे मसलों पर रिजर्व बैंक की राय पर ध्यान देना चाहिए, क्योंकि बैंकिंग तंत्र पहले से ही एनपीए के बोझ तले कराह रहा है। बैंकिंग नियामक होने के चलते आरबीआइ अपनी इस जिम्मेदारी से भी मुंह नहीं मोड़ सकता। दोनों पक्षों को बस एक-एक कदम पीछे खींचने की दरकार है, क्योंकि कहते हैं कि लंबी छलांग लगाने के लिए पीछे भी हटना होता है। नोटबंदी के बाद और जीएसटी से पहले सरकार और उसके बैंक में तकरार अर्थव्यवस्था की सेहत के लिए खराब ही होगी। वैसे इस पूरे प्रकरण पर जेटली की संयमित एवं परिपक्व प्रतिक्रिया यही संकेत करती है कि इस मोर्चे पर ज्यादा परेशान होने की जरूरत नहीं। यह परिवार के बीच विचारों का टकराव भर है।

Comments